पश्चिम एशिया तनाव से सप्लाई चेन प्रभावित, बासमती के दाम गिरे

मध्य प्रदेश के रायसेन और बालाघाट जिलों में चावल उद्योग इस समय गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारत के चावल निर्यात पर पड़ा है, जिससे बासमती और गैर-बासमती चावल की सप्लाई चेन प्रभावित हो गई है। रायसेन, जो बासमती चावल के बड़े निर्यात केंद्रों में से एक है, वहां से भेजा जाने वाला चावल बंदरगाहों, गोदामों और फैक्ट्रियों में फंसा हुआ है। निर्यातकों को समय पर ऑर्डर पूरा करने में भारी दिक्कत आ रही है। स्थिति को और गंभीर बनाते हुए माल ढुलाई दरों में करीब 30% तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि कंटेनरों की भारी कमी के कारण लागत और बढ़ गई है। पहले जो कंटेनर लगभग 2500 डॉलर में उपलब्ध था, अब वही 3200 डॉलर में भी मुश्किल से मिल रहा है। इस संकट का सीधा असर बाजार कीमतों पर पड़ा है। पूसा बासमती चावल के दाम में 300 से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक की गिरावट आई है, जिससे किसानों और व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है। धान की आवक भी धीरे-धीरे कम हो रही है और किसानों के पास सीमित स्टॉक ही बचा है, जिससे सप्लाई चेन और कमजोर हो रही है। रायसेन जिले में लगभग 3.45 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है और यहां से हर साल 6 लाख टन से अधिक चावल का उत्पादन होता है। हालांकि, मौजूदा हालात में कई चावल मिलें अस्थायी रूप से बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं। इसी तरह बालाघाट में, जहां से उबले हुए गैर-बासमती चावल का बड़ा निर्यात होता था, वहां भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। पहले जहां रोजाना करीब 500 टन चावल का निर्यात होता था, अब इसमें भारी गिरावट आई है। खासकर पूर्वी अफ्रीका के देशों को निर्यात लगभग ठप हो चुका है, जबकि पश्चिमी अफ्रीका में भी सीमित मात्रा में ही सप्लाई हो रही है। इस संकट का असर बड़े और छोटे दोनों व्यापारियों पर पड़ा है। बड़े उद्योगपतियों के कारोबार में करीब 25% तक की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि छोटे व्यापारी लगभग पूरी तरह से ठप हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही वैश्विक हालात सामान्य नहीं हुए, तो इसका असर न केवल चावल उद्योग बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। फिलहाल किसान, मिलर्स और निर्यातक सभी इस कठिन दौर से गुजर रहे हैं और स्थिति में सुधार की उम्मीद कर रहे हैं।

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