चक्रवात मुरासु का असर कमजोर, लेकिन कई राज्यों में बारिश का खतरा; किसान फसलों को लेकर रहें सतर्क
बंगाल की खाड़ी में बना चक्रवात मुरासु दक्षिण आंध्र प्रदेश की ओर बढ़ा और 3 नवंबर 2026 की सुबह नेल्लोर तथा नरसापुर के बीच, प्रकाशम जिले के ओंगोल के आसपास तट पार कर गया। तट से टकराते समय तूफान के दौरान हवाओं की रफ्तार लगभग 100–110 किलोमीटर प्रति घंटा रही और तेज झोंकों की गति करीब 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंची। जमीन की ओर बढ़ने के बाद इसकी ताकत धीरे-धीरे कम होती गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की 4 नवंबर की जानकारी के अनुसार, यह सिस्टम तटीय आंध्र प्रदेश और उससे लगे पूर्वी तेलंगाना के ऊपर गहरे अवदाब में बदल गया था। तूफान कमजोर होने के बावजूद इससे जुड़ी बारिश, गरज-चमक और तेज हवाओं को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है। आंध्र प्रदेश: तूफान का सीधा असर झेलने वाला क्षेत्र दक्षिणी तटीय आंध्र प्रदेश में चक्रवात मुरासु का सबसे सीधा प्रभाव देखने को मिला। प्रकाशम, बापटला, नेल्लोर, गुंटूर, कृष्णा, एनटीआर और पलनाडु जिलों में तेज हवाओं और भारी बारिश के कारण खेतों में पानी जमा होने की स्थिति बनी। एलुरु और गोदावरी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में भी बारिश से जुड़ी परेशानियां सामने आईं। प्रभावित स्थानों से पेड़ गिरने, मकानों और मछली पकड़ने वाली नावों को नुकसान, परिवहन में बाधा तथा खड़ी फसलों के प्रभावित होने की खबरें मिलीं। विशेष रूप से तटीय और निचले इलाकों में लगातार पानी जमा रहने से फसलों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। तट से दूर अन्य राज्यों में भी मौसम का असर मुरासु से जुड़ी मौसमी परिस्थितियों का असर आसपास के राज्यों के कुछ हिस्सों में भी देखने को मिला। तेलंगाना के पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों में बारिश को लेकर सतर्कता जरूरी रही। नलगोंडा, सूर्यापेट, नागरकुरनूल और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा से संबंधित जोखिमों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। तूफान की गतिविधियों के दौरान तमिलनाडु, पुडुचेरी, छत्तीसगढ़, केरल और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक के कुछ हिस्सों के लिए भी बारिश की चेतावनियां जारी की गई थीं। दक्षिणी ओडिशा में भी बारिश हुई और एहतियाती तैयारियां की गईं। हालांकि, इन क्षेत्रों को चक्रवात का लैंडफॉल क्षेत्र नहीं समझना चाहिए। मुरासु ने आंध्र प्रदेश के तट पर ही दस्तक दी थी। अलग-अलग जिलों में बारिश की मात्रा और समय अलग हो सकता है, इसलिए किसान स्थानीय मौसम चेतावनियों पर ध्यान दें। फसलों को नुकसान से बचाने के लिए तुरंत उठाएं कदम मौसम सुरक्षित होने पर किसान अपने खेतों का निरीक्षण करें और पानी निकासी के रास्तों में आई रुकावटों को हटाएं। धान की फसल में उसकी अवस्था के अनुसार अतिरिक्त पानी निकालें तथा स्थानीय कृषि सलाह का पालन करें। कपास, मक्का, दलहन और सब्जियों में गिरे हुए पौधों, टूटे तनों, क्षतिग्रस्त फूलों और फलों तथा पानी में डूबी जड़ों की जांच करें। बारिश जारी रहने या पत्तियों पर नमी होने के दौरान उर्वरक और पौध संरक्षण दवाओं का प्रयोग न करें। मौसम अनुकूल होने और कृषि विशेषज्ञ की सलाह मिलने के बाद ही इन कार्यों को दोबारा शुरू करें। रोगों से बचाव और रबी बुवाई में सावधानी जरूरी लगातार बारिश के बाद मिट्टी में अधिक नमी और वातावरण में उमस रहने से फफूंदजनित रोग तथा जड़ों से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं। किसान फसलों में असामान्य धब्बे, सड़न, मुरझाने या अन्य लक्षणों की नियमित जांच करें। समस्या की सही पहचान करने के बाद ही कृषि विशेषज्ञ की सलाह से उपचार करें। कटी हुई उपज को सूखे और सुरक्षित स्थान पर पहुंचाएं। बीज, खाद और कृषि उपकरणों को नमी से बचाकर रखें। जिन किसानों ने अभी रबी फसलों की बुवाई नहीं की है, वे पहले खेतों से अतिरिक्त पानी निकलने दें और मिट्टी में उचित नमी होने पर ही बुवाई करें। बहुत गीली जमीन में बुवाई करने से बीजों का अंकुरण कमजोर हो सकता है और शुरुआती पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। जिन किसानों ने पहले ही बुवाई कर ली है, वे खेतों में मिट्टी की पपड़ी बनने, बीजों के बहने और पौधों के असमान रूप से निकलने की स्थिति पर नजर रखें। प्रभावित किसान फसल और खेतों के नुकसान की तस्वीरें लें, रिकॉर्ड सुरक्षित रखें तथा नुकसान के आकलन और लागू बीमा या सहायता प्रक्रिया की जानकारी के लिए स्थानीय कृषि एवं राजस्व अधिकारियों से संपर्क करें। तटीय क्षेत्रों के निवासी और मछुआरे प्रशासन तथा मौसम विभाग की सुरक्षा सलाह का पालन करें। चक्रवात कमजोर होने के बाद भी खेतों से पानी निकालना और फसलों की नियमित निगरानी करना कृषि नुकसान कम करने के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।